الخميس ١٨ تشرين الثاني (نوفمبر) ٢٠٢١
بقلم حسن عبادي

متنفّس عبرَ القضبان 42

بدأت‌ ‌مشواري‌ ‌التواصليّ‌ ‌مع‌ ‌أسرى‌ ‌أحرار‌ ‌يكتبون‌ ‌رغم‌ ‌عتمة‌ ‌السجون‌ ‌في‌ ‌شهر‌ ‌حزيران‌ ‌
2019‌؛‌ ‌ودوّنت‌ ‌على‌ ‌صفحتي‌ ‌انطباعاتي‌ ‌الأوليّة

عقّبت‌ ‌الكاتبة‌ ‌نبيهة‌ ‌راشد‌ ‌جبارين:‌ ‌"ا‌لحرية‌ ‌للأسيرات‌ ‌والأسرى‌!‌ ‌لم‌ ‌يُخلق‌ ‌الإنسان‌ ‌ليُسجن‌!‌ ‌
دمتَ‌ ‌بوفاء‌ ‌وعطاء".‌ ‌ ‌

وعقّبت‌ ‌الصديقة‌ ‌المقدسيّة‌ ‌رندة‌ ‌شرف:‌ ‌"‌نجدد‌ ‌التحية‌ ‌والشكر‌ ‌لعملك‌ ‌المتميز‌ ‌فأنتم‌ ‌جسور‌ ‌تواصل‌ ‌
بين‌ ‌الاسرى‌ ‌والاهل‌ ‌خارج‌ ‌السجون،‌ ‌تحية‌ ‌تقدير‌ ‌لك‌ ‌ودعوات‌ ‌صادقه‌ ‌بأن‌ ‌يهون‌ ‌عليهم‌ ‌ظلام‌ ‌
السجون‌ ‌وأن‌ ‌يفك‌ ‌اسر‌ ‌جميع‌ ‌الاسرى.‌ ‌إنهم‌ ‌قلوبنا‌ ‌تنبض‌ ‌داخل‌ ‌السجون".‌ ‌

رضوان‌ ‌ينتظر‌ ‌

التقيت‌ ‌صباح‌ ‌الخميس‌ ‌28‌ ‌تشرين‌ ‌أوّل‌ ‌في‌ ‌سجن‌ ‌النقب‌ ‌الصحراويّ‌ ‌–كتسيعوت-‌ ‌(أنصار‌ ‌3‌)‌ ‌
بالأسير‌ ‌أحمد‌ ‌حمامرة‌ ‌بعد‌ ‌أن‌ ‌غادرت‌ ‌مدينة‌ ‌حيفا‌ ‌الخامسة‌ ‌والنصف‌ ‌صباحًا‌ ‌(رافقني‌ ‌الصديق‌ ‌
مصطفى‌ ‌نفاع‌ ‌مسافة‌ ‌263‌ ‌كم)‌ ‌لألتقيه‌ ‌وابتسامته‌ ‌الواثقة‌ ‌رغم‌ ‌اعتقاله‌ ‌إداريًا‌ ‌منذ‌ ‌
17.08.2020‌.‌ ‌

صوّر‌ ‌لي‌ ‌تفجير‌ ‌باب‌ ‌منزله‌ ‌في‌ ‌الخامسة‌ ‌صباحًا،‌ ‌عريس‌ ‌جديد،‌ ‌والعذاب‌ ‌الذي‌ ‌تعرّض‌ ‌له‌ ‌مباشرة‌ ‌
بعد‌ ‌الاعتقال،‌ ‌وقراره‌ ‌الاضراب‌ ‌عن‌ ‌الطعام‌ ‌وصورة‌ ‌رفيقه‌ ‌الأسير‌ ‌كايد‌ ‌الفسفوس‌ ‌(المضرب‌ ‌عن‌ ‌
الطعام)‌ ‌ومصيره‌ ‌تلاحقه‌ ‌كلّ‌ ‌الوقت.‌ ‌

وُلد‌ ‌بِكره‌ ‌رضوان‌ ‌يوم‌ ‌08.12.20‌ ‌ولم‌ ‌يحظَ‌ ‌باحتضانه‌ ‌بعد،‌ ‌رضوان‌ ‌يتوق‌ ‌لعناقه‌ ‌الأوّل،‌ ‌
وحُرم‌ ‌من‌ ‌مرافقة‌ ‌زوجته‌ ‌ساعة‌ ‌الولادة‌ ‌ومتابعة‌ ‌نموّه‌ ‌في‌ ‌أشهره‌ ‌الأولى،‌ ‌حال‌ ‌الحرمان‌ ‌الذي‌ ‌
يعانيه‌ ‌أبناء‌ ‌شعبنا.‌ ‌

حدّثني‌ ‌عن‌ ‌اعتقاله‌ ‌دون‌ ‌توجيه‌ ‌تهمة‌ ‌له،‌ ‌وأمر‌ ‌الاعتقال‌ ‌الإداري‌ ‌جاهز‌ ‌وموقّع‌ ‌يومان‌ ‌قبل‌ ‌
الاعتقال،‌ ‌والإجراءات‌ ‌صوريّة،‌ ‌تبعتها‌ ‌محاولات‌ ‌مراوغة‌ ‌وإغراءات‌ ‌مرفوضة‌ ‌للإيقاع‌ ‌به.‌ ‌

حدّثني‌ ‌مطوّلًا‌ ‌عن‌ ‌قراره‌ ‌تعليق‌ ‌إضرابه‌ ‌عن‌ ‌الطعام‌ ‌في‌ ‌الأوّل‌ ‌من‌ ‌أيلول‌ ‌وتبعاته‌ ‌والاتفّاق‌ ‌الذي‌ ‌
سبق‌ ‌فكّ‌ ‌الإضراب‌ ‌بتعهّد‌ ‌السطات‌ ‌عدم‌ ‌تجديد‌ ‌الاعتقال‌ ‌الإداري‌ ‌ومدى‌ ‌قانونيّته،‌ ‌ونقله‌ ‌من‌ ‌زنزانة‌ ‌
إلى‌ ‌أخرى‌ ‌ومن‌ ‌سجن‌ ‌لآخر‌ ‌بمحاولة‌ ‌للنيل‌ ‌من‌ ‌معنويّاته‌ ‌وصموده‌ ‌وكسر‌ ‌شوكته‌ ‌دون‌ ‌جدوى.‌ ‌

"‌قدّيسات‌ ‌فلسطين‌"‌ ‌


أي رسالة أو تعليق؟

مراقبة استباقية

هذا المنتدى مراقب استباقياً: لن تظهر مشاركتك إلا بعد التصديق عليها من قبل أحد المدراء.

من أنت؟
مشاركتك

لإنشاء فقرات يكفي ترك سطور فارغة.

فيسبوك منبر حر للثقافة والفكر والأدب
تويتر منبر حر للثقافة والفكر والأدب
الأعلى