الجمعة ١٣ آب (أغسطس) ٢٠٢١
بقلم عبد الستار نور علي

إيروتوكيا: هاتي الشفاهَ

"كُتِبَتْ‌ ‌القصيدةُ‌ ‌وأنا‌ ‌في‌ ‌الثامنة‌ ‌والعشرين،‌ ‌وظلَتْ‌ ‌حبيسةَ‌ ‌قضبانِ‌ ‌دفتري‌ ‌
القديم،‌ ‌لم‌ ‌ترَ‌ ‌النورَ‌ ‌في‌ ‌عالم‌ ‌النشر؛‌ ‌لهذا‌ ‌السببِ‌ ‌أو‌ ‌ذاك.‌ ‌واليوم‌ ‌أطلقُ‌ ‌
سراحَها؛‌ ‌لتعانقَ‌ ‌عيونَ‌ ‌المتلقين‌ ‌وتملأ‌ ‌كؤوسَ‌ ‌ذائقتهم،‌ ‌سلباً‌ ‌أم‌ ‌إيجاباً،‌ ‌
قبلَ‌ ‌أنْ‌ ‌نودِّعَ‌ ‌الدنيا،‌ ‌فتختفي‌ ‌حيثُ‌ ‌هي‌ ‌في‌ ‌حبسها.‌ ‌فمعذرةً‌ ‌من‌ ‌قرائي‌ ‌
الأعزاء‌ ‌الكرام؛‌ ‌عساها‌ ‌لا‌ ‌تُخدشُهم."‌ ‌

هاتي‌ ‌الشفاهَ،‌ ‌فقد‌ ‌أضنانيَ‌ ‌السهرُ‌ ‌
هاتي‌ ‌العيونَ‌،‌ ‌ففي‌ ‌أنهارِها‌ ‌الدُرَرُ‌ ‌
هـاتي‌ ‌الخدودَ‌،‌ ‌دماءً‌ ‌فيَّ‌ ‌نازفـةً‌،‌ ‌
لونَ‌ ‌الشقيقِ،‌ ‌وجمرَ‌ ‌النارِ‌ ‌أستعِرُ‌ ‌
أذوبُ‌ ‌في‌ ‌الجمْرِ‌ ‌أروي‌ ‌منْ‌ ‌مناهلِهِ‌ ‌
قلبي‌ ‌وروحي،‌ ‌فلا‌ ‌أبقي‌،‌ ‌ولا‌ ‌أذَرُ‌ ‌
عيناكِ‌ ‌نجمانِ‌ ،‌ ‌إشراقاً‌ ‌وتحليةً‌ ،‌ ‌
غارَ‌ ‌النهارُ،‌ ‌وغارَ‌ ‌الشمسُ‌ ‌والقمرُ‌ ‌


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