السبت ٥ حزيران (يونيو) ٢٠٢١
الرسالة 52
بقلم فراس حج محمد

خيباتيَ‌ ‌المتوقعة‌ ‌وغير‌ ‌المتوقّعة‌ ‌

أسعدت‌ ‌أوقاتاً‌ ‌أيتها‌ ‌الحبيبة‌ ‌الرائعة،‌ ‌أنتِ‌ ‌هناك‌ ‌وأنا‌ ‌هنا،‌ ‌يا‌ ‌لهذين‌ ‌الظرفين‌ ‌المتناقضين.‌ ‌أكاد‌ ‌أصدق‌ ‌

أنهما‌ ‌ليسا‌ ‌نقيضين،‌ ‌وقد‌ ‌أثبتت‌ ‌الأحداث‌ ‌أنهما‌ ‌ليسا‌ ‌نقيضين.‌ ‌اليوم‌ ‌هو‌ ‌ذكرى‌ ‌النكسة،‌ ‌ذكرى‌ ‌هزيمة‌ ‌

حزيران،‌ ‌هذه‌ ‌الهزيمة‌ ‌المذلة‌ ‌إلى‌ ‌درجة‌ ‌الخزي‌ ‌التاريخي‌ ‌المزلزل‌ ‌الذي‌ ‌أسقط‌ ‌العرب‌ ‌وتاريخ‌ ‌
العرب‌ ‌في‌ ‌حمأة‌ ‌طين‌ ‌لم‌ ‌يفلحوا‌ ‌إلى‌ ‌الآن‌ ‌من‌ ‌التخلص‌ ‌منها،‌ ‌بل‌ ‌إن‌ ‌النظام‌ ‌العربي‌ ‌الرسمي‌ ‌المتعاون‌ ‌

مع‌ ‌الدول‌ ‌الكبرى‌ ‌والدلوعة‌ ‌"إسرائيل"‌ ‌إلى‌ ‌حد‌ ‌العبودية‌ ‌يغوص‌ ‌أكثر‌ ‌وأكثر‌ ‌في‌ ‌وحول‌ ‌الهزيمة‌ ‌
يوميّاً،‌ ‌لا‌ ‌يقف‌ ‌الأمر‌ ‌على‌ ‌التطبيع‌ ‌العلني،‌ ‌ثمة‌ ‌ما‌ ‌هو‌ ‌مخفي‌ ‌أشد‌ ‌جُرماً،‌ ‌ولم‌ ‌تفلح‌ ‌مسرحيات‌ ‌الأنظمة‌ ‌

والميلشيات‌ ‌التابعة‌ ‌لها‌ ‌مهما‌ ‌أحرزت‌ ‌من‌ ‌"نصر"‌ ‌أن‌ ‌تمسح‌ ‌عارا‌ ‌واحدا‌ ‌مركباً‌ ‌من‌ ‌هزيمتين‌ ‌اثنتين‌ ‌
في‌ ‌غضون‌ ‌تسعة‌ ‌عشر‌ ‌عاماً.‌ ‌يا‌ ‌إلهي،‌ ‌ما‌ ‌أصدق‌ ‌نزار‌ ‌قباني!‌ ‌فهم‌ ‌من‌ ‌نصف‌ ‌قرنٍ‌ ‌لم‌ ‌يُرجعوا‌ ‌
زيتونة‌ ‌أو‌ ‌برتقالة،‌ ‌ولم‌ ‌يمسحوا‌ ‌عن‌ ‌التاريخ‌ ‌عاره،‌ ‌ولن‌ ‌يفعلوها‌ ‌صدقيني،‌ ‌لقد‌ ‌نُصّبوا‌ ‌ليناصبونا‌ ‌
العداء،‌ ‌وليخدموا‌ ‌أعداءنا.‌ ‌

لا‌ ‌أخفيك‌ ‌أنني‌ ‌أشعر‌ ‌بالحزن‌ ‌والغضب‌ ‌والرغبة‌ ‌في‌ ‌الانتقام‌ ‌من‌ ‌هؤلاء‌ ‌جميعاً،‌ ‌كلما‌ ‌تذكرت‌ ‌أنني‌ ‌
أعيش‌ ‌تحت‌ ‌الاحتلال،‌ ‌ولا‌ ‌أستطيع‌ ‌مثلا‌ ‌أن‌ ‌أتنقل‌ ‌في‌ ‌وطني‌ ‌دون‌ ‌هاجس‌ ‌جندي‌ ‌أو‌ ‌مجندة‌ ‌يوقفني‌ ‌

على‌ ‌حاجز‌ ‌طيّار‌ ‌أو‌ ‌ثابت.‌ ‌الجنود‌ ‌صاروا‌ ‌أكثر‌ ‌شراسة‌ ‌واستعداداً؛‌ ‌إنهم‌ ‌دائمو‌ ‌التصويب‌ ‌علينا‌ ‌من‌ ‌
النقطة‌ ‌التي‌ ‌نطل‌ ‌فيها‌ ‌على‌ ‌الحواجز‌ ‌حيث‌ ‌تربض‌ ‌بنادقهم‌ ‌النهمة‌ ‌الباحثة‌ ‌عن‌ ‌فريستها‌ ‌لتزجّي‌ ‌بها‌ ‌

وقت‌ ‌الفراغ‌ ‌والملل‌ ‌على‌ ‌الحواجز،‌ ‌تظل‌ ‌فوهة‌ ‌البندقة‌ ‌مصوبة‌ ‌على‌ ‌أفئدتنا‌ ‌ورؤسنا‌ ‌حتى‌ ‌نمر‌ ‌عنهم‌ ‌

ونتجاوزهم.‌ ‌تصوري‌ ‌أنه‌ ‌ممنوع‌ ‌عليك‌ ‌أن‌ ‌تشير‌ ‌بيدك،‌ ‌أو‌ ‌أن‌ ‌تستعمل‌ ‌هاتفك،‌ ‌أو‌ ‌أن‌ ‌تنظر‌ ‌إليهم،‌ ‌
عليك‌ ‌أن‌ ‌تمر‌ ‌عن‌ ‌الحاجز‌ ‌وكأنك‌ ‌صنم.‌ ‌إننا‌ ‌بالفعل‌ ‌أصنامٌ‌ ‌لا‌ ‌تهشّ‌ ‌ولا‌ ‌تنشّ،‌ ‌ولا‌ ‌يحق‌ ‌لك‌ ‌أن‌ ‌تبتسم،‌ ‌

لأنك‌ ‌ستعرض‌ ‌نفسك‌ ‌ومن‌ ‌معك‌ ‌في‌ ‌السيارة‌ ‌إلى‌ ‌الانتقام‌ ‌المباشر،‌ ‌إذا‌ ‌ما‌ ‌تحرك‌ ‌الحسّ‌ ‌الأمنيّ‌ ‌لهذا‌ ‌

الجندي‌ ‌المتربص‌ ‌بحياتنا.‌ ‌ما‌ ‌هي‌ ‌إلا‌ ‌صلية‌ ‌رصاص‌ ‌واحدة‌ ‌يفرغها‌ ‌في‌ ‌أجسادنا‌ ‌وينتهي‌ ‌أمرنا،‌ ‌
لنصبح‌ ‌خبراً‌ ‌في‌ ‌شريط‌ ‌أنباء‌ ‌العواجل‌ ‌الفضائية.‌ ‌يا‌ ‌له‌ ‌من‌ ‌مصير‌ ‌أسود‌ ‌متوقع‌ ‌كل‌ ‌يوم،‌ ‌كلما‌ ‌مررنا‌ ‌
عن‌ ‌حاجز‌ ‌ملعون!‌ ‌


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