الخميس ١ تموز (يوليو) ٢٠٢١
بقلم علي القاسمي

مادموزيل‌ ‌كوليت‌ ‌لابيتش‌ ‌

وبمرور‌ ‌الوقت،‌ ‌توثَّقت‌ ‌علاقتنا،‌ ‌وأستطيع‌ ‌القول‌ ‌إنّنا‌ ‌ـ‌ ‌أنا‌ ‌والآنسة‌ ‌كوليت‌ ‌ـ‌ ‌أصبحنا‌ ‌صديقيْن‌ ‌حميميْن،‌ ‌يبوح‌ ‌أحدنا‌ ‌للآخر‌ ‌ببعض‌ ‌أسراره.‌ ‌وذات‌ ‌مساء،‌ ‌كنا‌ ‌جالسيْن‌ ‌في‌ ‌شرفةِ‌ ‌شقَّة‌ ‌
كوليت‌ ‌المطلَّة‌ ‌على‌ ‌البحر،‌ ‌وقد‌ ‌اتشحت‌ ‌السماء‌ ‌بثوبٍ‌ ‌فضفاض‌ ‌رمادي‌ ‌اللون،‌ ‌وانعكس‌ ‌لونها‌ ‌على‌ ‌البحر‌ ‌فأمسى‌ ‌مكفهرَ‌ ‌الوجه‌ ‌مزبداً‌ ‌مرعدَ‌ ‌الأمواج.‌ ‌وكانت‌ ‌كوليت،‌ ‌على‌ ‌غير‌ ‌عادتها،‌ ‌صامتةً‌ ‌تطيل‌ ‌النظر‌ ‌إلى‌ ‌سطح‌ ‌البحر‌ ‌من‌ ‌بعيد.‌ ‌افتقدتُ‌ ‌ابتسامتها‌ ‌الحلوة‌ ‌الأخاذة‌ ‌وطلَّة‌ ‌أسنانها‌ ‌الناصعة‌ ‌البياض،‌ ‌فقد‌ ‌كانت‌ ‌غيوم‌ ‌الأسى‌ ‌مخيمةً‌ ‌على‌ ‌كيانها‌ ‌كلّه:‌ ‌على‌ ‌ملامح‌ ‌وجهها‌ ‌الجميل،‌ ‌على‌ ‌عينيها‌ ‌الزرقاويْن‌ ‌الواسعتيْن،‌ ‌على‌ ‌شفتيْها‌ ‌الورديتيْن‌ ‌المرتعشتيْن،‌ ‌وعلى‌ ‌صوتها‌ ‌الذي‌ ‌تخنقه‌ ‌انفعالاتُها‌ ‌العميقة‌ ‌عندما‌ ‌تكلّمت‌ ‌وهي‌ ‌تغالب‌ ‌دموعاً‌ ‌ترقرقت‌ ‌في‌ ‌عينيها‌ ‌الناعستين‌ ‌في‌ ‌تلك‌ ‌اللحظة.‌ ‌لعلَّ‌ ‌أمراً‌ ‌حدث‌ ‌ذلك‌ ‌اليوم،‌ ‌وعزمتْ‌ ‌على‌ ‌أن‌ ‌تفضي‌ ‌إليَّ‌ ‌بأحزانها‌ ‌للتخفيف‌ ‌منها.‌ ‌قالت:‌ ‌
ـ‌ ‌"‌ ‌كنتُ‌ ‌طالبةً‌ ‌جامعيةً‌ ‌في‌ ‌ربيع‌ ‌العمر‌ ‌في‌ ‌باريس،‌ ‌والتقيتُ‌ ‌بأحد‌ ‌طلاب‌ ‌الجامعة،‌ ‌ووقعنا‌ ‌في‌ ‌الغرام‌ ‌من‌ ‌النظرة‌ ‌الأولى.‌ ‌(كلُّ‌ ‌شيءٍ‌ ‌في‌ ‌باريس‌ ‌يدعوك‌ ‌للحبّ‌ ‌وأنتَ‌ ‌في‌ ‌ريعان‌ ‌العمر).‌ ‌سحرني‌ ‌
بشخصيته‌ ‌الجذابة،‌ ‌ولطفه،‌ ‌واهتمامه‌ ‌بي.‌ ‌وكان‌ ‌مشبَّعاً‌ ‌بالثقافة‌ ‌الفرنسية،‌ ‌فقد‌ ‌كانت‌ ‌أمُّه‌ ‌فرنسية،‌ ‌أمّا‌ ‌أبوه‌ ‌فلبنانيٌّ.‌ ‌ومضت‌ ‌سنواتٌ‌ ‌ونحن‌ ‌في‌ ‌حلم‌ ‌جميل،‌ ‌وكنتُ‌ ‌أساعده‌ ‌مادياً‌ ‌ومعنوياً؛‌ ‌وأعطيته‌ ‌كلَّ‌ ‌ما‌ ‌وسعِ‌ ‌فتاةٍ‌ ‌أًن‌ ‌تهَب‌ ‌حبيبها.‌ ‌ومركزي‌ ‌للتجميل‌ ‌في‌ ‌باريس‌ ‌يدرُّ‌ ‌عليَّ‌ ‌الربح‌ ‌الوفير.‌ ‌وذات‌ ‌يوم،‌ ‌فاجأني‌ ‌ليخبرني‌ ‌بأنَّه‌ ‌عزمَ‌ ‌على‌ ‌العودة‌ ‌إلى‌ ‌بيروت.‌ ‌وكان‌ ‌جوابي‌ ‌حاضراً‌ ‌لا‌ ‌يحتاج‌ ‌إلى‌ ‌تفكير:‌ ‌

ـ‌ ‌"سأذهب‌ ‌حيثما‌ ‌تذهب،‌ ‌فليس‌ ‌ثمّة‌ ‌معنى‌ ‌لحياتي‌ ‌من‌ ‌دونكَ."‌ ‌

ابتسمَ‌ ‌ولم‌ ‌يعترض‌ ‌على‌ ‌ما‌ ‌قلتُ.‌ ‌

وغادر‌ ‌هو‌ ‌فرنسا‌ ‌إلى‌ ‌بيروت،‌ ‌وبقيتُ‌ ‌أنا‌ ‌بعض‌ ‌الوقت‌ ‌في‌ ‌باريس‌ ‌لترتيب‌ ‌أمر‌ ‌مركزي‌ ‌للتجميل‌ ‌ثمَّ‌ ‌
انتقلتُ‌ ‌إلى‌ ‌بيروت‌ ‌لأفتح‌ ‌أكبر‌ ‌مركز‌ ‌للتجميل‌ ‌فيها.‌ ‌

في‌ ‌البداية‌ ‌كان‌ ‌يلتقي‌ ‌بي‌ ‌مرَّة‌ ‌في‌ ‌الأسبوع‌ ‌متعلِّلاً‌ ‌بانشغاله‌ ‌في‌ ‌العمل.‌ ‌ثمَّ‌ ‌أخذت‌ ‌زياراتُه‌ ‌تقلُّ‌ ‌
تدريجياً.‌ ‌وعندما‌ ‌يراني،‌ ‌يأخذ‌ ‌في‌ ‌الشكوى‌ ‌من‌ ‌صعوباتٍ‌ ‌ماليةٍ‌ ‌تواجهه،‌ ‌ويطلب‌ ‌مني‌ ‌بلطف‌ ‌أن‌ ‌
أقرضه‌ ‌بعض‌ ‌المال.‌ ‌فأسرع‌ ‌إلى‌ ‌تلبية‌ ‌طلبه.‌ ‌وراحت‌ ‌زياراته‌ ‌تتضاءل‌ ‌والمبالغ‌ ‌التي‌ ‌يطلب‌ ‌
اقتراضها‌ ‌تزداد..."‌ ‌


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