الخميس ٢٤ كانون الأول (ديسمبر) ٢٠٢٠
بقلم رامز محيي الدين علي

هموم بين عامين


في‌ ‌نهايةِ‌ ‌كلِّ‌ ‌عامٍ‌ ‌يحتفلُ‌ ‌العالمُ‌ ‌بنهايةِ‌ ‌عامٍ‌ ‌مضَى‌ ‌ويستقبلُ‌ ‌حولاً‌ ‌جديداً،‌ ‌وكأنَّ‌ ‌الكونَ‌ ‌كان‌ ‌في‌ ‌رحمِ‌ ‌الشَّقاءِ،‌ ‌والآنَ‌ ‌ينفضُ‌ ‌عن‌ ‌كاهلِه‌ ‌غبارَ‌ ‌التّعبِ‌ ‌والإعياءِ،‌ ‌ويفتحُ‌ ‌أجفانَه‌ ‌لفردوسٍ‌ ‌جديدٍ‌ ‌يخلِّصُه‌ ‌من‌ ‌همومِه‌ ‌وصراعاتِه‌ ‌وتناقضاتِه‌ ‌وجوعِه‌ ‌وفقرِه‌ ‌ وأحزانِه‌ ‌وآلامِه‌ ‌وظلمِه‌ ‌وطغيانِه‌ ‌ودمارِه‌ ‌وكلِّ‌ ‌عللِه‌ ‌وأسقامِه..‌ ‌

ولكنَّ‌ ‌مشاعرَ‌ ‌العالمِ‌ ‌بمجتمعاتِه‌ ‌ودولِه‌ ‌ومؤسّساتِه‌ ‌وأفرادِه‌ ‌وطبقاتِه‌ ‌وأعراقِه‌ ‌ودياناتِه‌ ‌ومذاهبِه..‌ ‌ليستْ‌ ‌على‌ ‌سويّةٍ‌ ‌واحدةٍ،‌ ‌وإنّما‌ ‌هي‌ ‌في‌ ‌محيطاتٍ‌ ‌تتلاطمُ‌ ‌أمواجُها،‌ ‌ويتطايرُ‌ ‌رذاذُها،‌ ‌وتتصارعُ‌ ‌أعماقُها،‌ ‌وتهتاجُ‌ ‌بالتّيّاراتِ‌ ‌العاصفةِ،‌ ‌ويعبثُ‌ ‌بها‌ ‌القمرُ‌ ‌بين‌ ‌مدٍّ‌ ‌وجزرٍ،‌ ‌وتحكمُها‌ ‌أشعّةُ‌ ‌الشَّمسِ‌ ‌جموداً‌ ‌وجليداً‌ ‌وبرودةً‌ ‌أو‌ ‌غلياناً‌ ‌وهجيراً‌ ‌ودفئاً..‌ ‌

وإليكم‌ ‌خرائطُ‌ ‌مشاعرِ‌ ‌البشريّةِ،‌ ‌وقد‌ ‌رسمَتْها‌ ‌يراعتِي‌ ‌بالكلماتِ‌ ‌التي‌ ‌لا‌ ‌تعرفُ‌ ‌البهرجةَ‌ ‌أو‌ ‌الزّيفَ..‌ ‌ولا‌ ‌تنطقُ‌ ‌عن‌ ‌هوى‌ ‌المجاملةِ‌ ‌والتَّصنُّعِ‌ ‌والمحاباةِ..‌ ‌ولا‌ ‌تَخشى‌ ‌أن‌ ‌يغتالَها‌ ‌القراصنةُ‌ ‌المتربِّصُون‌ ‌بها‌ ‌على‌ ‌حدودِ‌ ‌الأحلامِ،‌ ‌الشّاهرون‌ ‌سيوفَهم‌ ‌على‌ ‌كلِّ‌ ‌لسانٍ..‌ ‌المسلِّطُون‌ ‌أسلحتَهم‌ ‌على‌ ‌القصائدِ‌ ‌وكلِّ‌ ‌أنواعِ‌ ‌الكتابةِ..‌ ‌القابعُون‌ ‌في‌ ‌ظلماتِ‌ ‌اللّيلِ‌ ‌يصطادُون‌ ‌النُّجومَ،‌ ‌ويلعنُون‌ ‌ضياءَ‌ ‌الشَّمسِ‌ ‌ونورَ‌ ‌القمرِ،‌ ‌وينقضُّون‌ ‌كالأباليسِ‌ ‌على‌ ‌الفوانيسِ‌ ‌والشُّموعِ‌ ‌كي‌ ‌تضيعَ‌ ‌الكلماتُ‌ ‌في‌ ‌عتمةِ‌ ‌السُّجون..‌ ‌
ويلتهمونَ‌ ‌ثرواتِ‌ ‌الأرضِ‌ ‌ويخزِّنُونها‌ ‌قاتاً‌ ‌يخدِّرُون‌ ‌به‌ ‌أجسادَهم‌ ‌وأرواحَهم..‌ ‌

وينامونَ‌ ‌كالتّنِّين،‌ ‌لكنَّ‌ ‌أفكارَهم‌ ‌وأحلامَهم‌ ‌الشَّيطانيّةَ‌ ‌تتغلغلُ‌ ‌إلى‌ ‌حنايا‌ ‌الكونِ‌ ‌وأوصالِه‌ ‌وجنباتِه،‌ ‌وتستمرُّ‌ ‌في‌ ‌امتصاصِ‌ ‌الخيراتِ‌ ‌والدّماء‌ ‌كالسَّرطانِ‌ ‌المستبدِّ‌ ‌بالجسدِ‌ ‌العليلِ‌ ‌غيرَ‌ ‌مبالٍ‌ ‌بحصونِ‌ ‌الأطبّاء‌ ‌التي‌ ‌يبنونَها‌ ‌في‌ ‌جسدِ‌ ‌المريضِ‌ ‌عساها‌ ‌تقاومُ‌ ‌المرضَ‌ ‌الشّيطانيَّ‌ ‌الخبيثَ،‌ ‌فتخدعُه‌ ‌وتصطادُ‌ ‌أورامَه‌ ‌دون‌ ‌جدْوى..‌ ‌

ولنبدأْ‌ ‌بخارطةِ‌ ‌الفقراءِ‌ ‌والمساكينِ،‌ ‌فهم‌ ‌يحتلُّون‌ ‌مساحةَ‌ ‌البحارِ‌ ‌والمحيطاتِ‌ ‌من‌ ‌الكرةِ‌ ‌الأرضيّة،‌ ‌ولكنَّهم‌ ‌لا‌ ‌يملكون‌ ‌من‌ ‌ثرواتِها‌ ‌إلّا‌ ‌ما‌ ‌يسدُّ‌ ‌رمقَهم‌ ‌ويملأُ‌ ‌معدتَهم،‌ ‌والكثيرُ‌ ‌منهم‌ ‌يقتاتُ‌ ‌على‌ ‌التّسوُّلِ‌ ‌أو‌ ‌حاوياتِ‌ ‌القمامةِ‌ ‌أو‌ ‌بعضِ‌ ‌أرغفةٍ‌ ‌يُلقيها‌ ‌عليهم‌ ‌سادتُهم‌ ‌إحساناً‌ ‌لهم‌ ‌واعترافاً‌ ‌بجميلِهم‌ ‌وحسنِ‌ ‌صنيعِهم‌ ‌في‌ ‌الخدمةِ‌ ‌أو‌ ‌العمالةِ‌ ‌أو‌ ‌الطّاعةِ‌ ‌والتّبعيّةِ‌ ‌والولاءِ..‌ ‌

فإذا‌ ‌ما‌ ‌أبحرْنا‌ ‌في‌ ‌أحلامِهم،‌ ‌وغصْنا‌ ‌في‌ ‌أفكارِهم‌ ‌ومشاعرِهم..‌ ‌تحطَّمتْ‌ ‌مراكبُنا‌ ‌وغرقَتْ،‌ ‌وعدْنا‌ ‌خائبينَ؛‌ ‌لنقولَ‌ ‌للعامِ‌ ‌المنصرمِ:‌ ‌شكراً‌ ‌لكَ‌ ‌لأنَّك‌ ‌لم‌ ‌تحملْنا‌ ‌معك‌ ‌إلى‌ ‌حيثُ‌ ‌ولّيْتَ..‌ ‌ولا‌ ‌أهلاً‌ ‌ولا‌ ‌مرحباً‌ ‌بالعامِ‌ ‌الجديدِ..‌ ‌لأنّه‌ ‌لن‌ ‌يحملَ‌ ‌لنا‌ ‌في‌ ‌جعبتِه‌ ‌غيرَ‌ ‌الألمِ‌ ‌والمرارةِ‌ ‌والشّقاء..‌ ‌

الفقراءُ‌ ‌في‌ ‌ليلةِ‌ ‌رأسِ‌ ‌السّنةِ‌ ‌الميلاديّة‌ ‌يحلمُون‌ ‌برغيفِ‌ ‌خبزٍ‌ ‌غيرِ‌ ‌معجونٍ‌ ‌بدموعِهم‌ ‌ودمائِهم..‌ ‌ويبنون‌ ‌في‌ ‌أحلامِهم‌ ‌بيوتاً‌ ‌تأويهِم‌ ‌وتَقيهم‌ ‌حرَّ‌ ‌الصّيفِ‌ ‌وقرّ‌ ‌الشّتاءِ..‌ ‌الفقراءُ‌ ‌يتطلّعون‌ ‌إلى‌ ‌غدٍ‌ ‌مشرقٍ‌ ‌يعيشون‌ ‌فيه‌ ‌بكرامةٍ‌ ‌وحرّيّةٍ،‌ ‌ولا‌ ‌يرجُون‌ ‌من‌ ‌السّماءِ‌ ‌غيرَ‌ ‌الرّحمةِ‌ ‌والرّأفةِ‌ ‌بهم..‌ ‌

الفقراءُ‌ ‌في‌ ‌هذه‌ ‌اللّيلةِ‌ ‌يفرحُون‌ ‌إذا‌ ‌لم‌ ‌يَطرقْ‌ ‌أبوابَهم‌ ‌الجباةُ‌ ‌لسدادِ‌ ‌دَينٍ‌ ‌أو‌ ‌ضريبةٍ‌ ‌متراكمةٍ‌ ‌عليهم‌ ‌من‌ ‌الأيّامِ‌ ‌الخوالي..‌ ‌وتسهَدُ‌ ‌عيونُهم‌ ‌ويؤرّقُها‌ ‌التّعبُ‌ ‌والهمومُ،‌ ‌فلا‌ ‌يُبالون‌ ‌برأسِ‌ ‌السّنةِ‌ ‌ولا‌ ‌بمتنِها‌ ‌ولا‌ ‌بذيلِها‌ ‌ولا‌ ‌بحواشيِها..‌ ‌الفقراءُ‌ ‌بشرٌ‌ ‌ثارُوا‌ ‌على‌ ‌الطُّغاةِ‌ ‌والمستبدّين‌ ‌من‌ ‌ساسةٍ‌ ‌رفعت‌ ‌كراسيَّها‌ ‌إلى‌ ‌عرشِ‌ ‌السّماء،‌ ‌وجعلتْ‌ ‌من‌ ‌أهوائِها‌ ‌وغرائزِها‌ ‌قوانينَ‌ ‌تُمطرُها‌ ‌السّماءُ،‌ ‌وحوّلتِ‌ ‌الإلهَ‌ ‌إلى‌ ‌فكرةٍ‌ ‌تَطويها‌ ‌الكتبُ‌ ‌السّماويّةُ‌ ‌بين‌ ‌أسفارِها‌ ‌وآياتِها..‌ ‌وصارتْ‌ ‌هي‌ ‌الإلهَ‌ ‌الذي‌ ‌يقولُ‌ ‌للعالمِ‌ ‌كنْ‌ ‌فيكون..‌ ‌وصارتِ‌ ‌الشّعوبُ‌ ‌عبيداً‌ ‌يركعون‌ ‌أمام‌ ‌عروشِهم‌ ‌ويسجدُون‌ ‌لهم‌ ‌في‌ ‌طاعةٍ‌ ‌عمياءَ..‌ ‌


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